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साठोत्तरी उपन्यासों में नारी

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यह सर्वविविद है कि आधुनिक युग की सबसे महत्वपूर्ण सशक्त तथा प्रिय विधा उपन्यास में मानव जीवन के सभी पक्षो को समेटने की दृष्टी रहती है , ऐसा कहना अतिशयोक्तिपूर्ण नहीं होगा | आजादी के बाद भारतीय समाज तथा साहित्य में बदलाव स्पष्ट रूप में देखने को मिलते है | साठोत्तरी शब्द के बाद की रचनाओं के बारे में कहा जाता है | भारतीय समाज जीवन में पुराने से पुराने गुलाम दलित और नारी है | हमें यह आज के युग में मानना पड़ेगा की साहित्य जगत में दलित और नारी का स्थान विशेश रूप से रहा है | दलित तथा नारियों की समस्या आज के काल में नहीं है ऐसा मानना भोलापन ही होगा |
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